रायपुर। सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक व जननेता रघु ठाकुर ने कहा है कि हिन्दी विरोध के समान मुद्दे पर केन्द्र सरकार को बिना भेदभाव के कार्रवाई करनी चाहिए। इस मसले पर केन्द्र सरकार ने जहां तमिलनाडु में अनुदान राशि रोक दी है वहीं महाराष्ट्र की इसी गलती पर वह मौन है। महाराष्ट्र में जिस तरह स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई बंद की गई है और तीन लाख गैर मराठी आटो चालकों के लिए मराठी भाषा के प्रमाण-पत्र को जरूरी किया है वह एक तरह से तुफ़ान आने से पहले की शांति है। इस तरह के अविवेकपूर्ण फैसलों से देश की एकता-अखंडता प्रभावित होती है और क्षेत्रियता का जहर फैलता है। इस तरह के किसी भी आशंका और भय के वातावरण को समाप्त करना है जिससे कोई खतरा पैदा हो।
रघु ठाकुर आज रायपुर के प्रेस- क्लब में ‘ भाषायी विवाद और भारत का भविष्य ‘ पर केन्द्रित परिचर्चा में आयोजन के अध्यक्ष के रूप में बोल रहे थे। साहित्यकार रामकुमार तिवारी, पत्रकार रवि भोई, प्रफुल्ल ठाकुर व जयन्त सिंह तोमर ने भी इस परिचर्चा में वक्ता के रूप में संबोधित किया।
रघु ठाकुर ने बांग्लादेश को भाषाई अलगाववाद का उदाहरण देते हुए कहा कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने ढाका में जाकर बंगला के ऊपर उर्दू थोपने का प्रयास किया था जिसका नतीजे में बांग्लादेश अलग राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। वैश्विक कारपोरेट ताकतें भारत में भाषा के आधार पर इसी तरह का अलगाववाद पैदा करने की फिराक में हैं। भाषा के आधार पर अगर लोग कट्टर होंगे देश टूटेगा ही, बनेगा नहीं।
रघु ठाकुर ने बताया कि नई शिक्षा नीति के तहत हर प्रांत में स्कूलों में उस प्रांत के बच्चों की मातृभाषा के साथ कोई एक राष्ट्रीय भाषा हिन्दी या कोई अन्य एक विदेशी भाषा सीखने-सिखाने का प्रावधान है। लेकिन महाराष्ट्र की सरकार ने हिन्दी को इसमें से अलग कर दिया। फिर वहां के परिवहन विभाग ने गैर मराठी आटोचालकों के लिए मराठी का प्रमाणपत्र लेना जरूरी कर दिया। महाराष्ट्र में भाजपा का ही मुख्यमंत्री है। लेकिन हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान के नाम पर सत्ता में आई केन्द्र सरकार महाराष्ट्र के इस फैसले पर मौन साधे हुए है।

रघु ठाकुर ने कहा महात्मा गांधी, डा. राममनोहर लोहिया सहित, लोकमान्य तिलक, काका कालेलकर जैसे अनेक नायकों ने अंग्रेजी की वर्चस्ववादी, साम्राज्यवादी औपनिवेशिक मानसिक दासता से मुक्ति के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने की जरूरत महसूस की थी। हिन्दी राष्ट्रभाषा बनते बनते रह गई और राजभाषा तक सीमित हो गई, और अब उसे अन्य भारतीय भाषाओं के वैमनस्य से जूझना पड़ रहा है। देश के नायक राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषाओं के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध विकसित होते देखना चाहते थे, लेकिन इसके विपरित चीजें बिगड़ रही हैं।
रघु ठाकुर ने कहा कि देश की एकता अखंडता को बनाए रखने के लिए हर देशवासी को कोई न कोई एक भारतीय भाषा तो सीखनी ही चाहिए, बल्कि हर प्रांत के लोगों से मित्रता कायम करनी चाहिए।
हमें इस बात को समझना होगा कि ईसाई बहुल योरप में भाषा के आधार पर राष्ट्रीयता की भावना पैदा हुई , लोग एकजुट हुए। यहां धर्म से अधिक भाषा का असर प्रबल हुआ।
समाजवादी चिंतक ने कहा, भारत में डा. लोहिया जैसे नायकों ने आजादी के बाद हिन्दी और भारतीय भाषाओं के पक्ष में वातावरण बनाकर औपनिवेशिक – साम्राज्यवादी चंगुल से मुक्ति का जो अभियान चलाया था, ऐसा लगता है कि वह आज बहुत पीछे छूट गया है। लोहिया ने पेरियार से पूछा था कि क्या आप हिन्दी विरोधी हैं? तब पेरियार ने कहा था कि मैं किसी भी प्रकार का वर्चस्व थोपने का विरोधी हूं, हिन्दी विरोधी नहीं। तब लोहिया और पैरियार ने तय किया था कि अगली मुलाकात तक दोनों एक दूसरे की भाषा सीख लेंगे।
साहित्यकार रामकुमार तिवारी ने इस अवसर पर कहा कि छोटी छोटी अस्मिताओं को बड़ी में समाहित करने से ही देश बनते हैं। भाषा भी ऐसी ही एक अस्मिता का मुद्दा है। जिस भारत में आजादी के बाद महात्मा गांधी ने कहा था कि दुनिया से कह दो कि गांधी को अंगरेजी नहीं आती, वहां आजादी के इतने साल बाद भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर विवाद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत में इस दिशा में संवाद से समस्या के समाधान की पहल करने की जरूरत है। भारत एक ऐसा देश है जहां उत्तर से लेकर दक्षिण तक संवाद में नैरंतर्य है। यहां विविधता में जो एकता थी, भिन्नता उसकी जगह लेती जा रही है।
पत्रकार रवि भोई ने हिन्दी व भारतीय भाषाओं के बीच विवाद को राजनीतिक मुद्दा बताते हुए कहा कि रघु ठाकुर जी ने इस दिशा में जो पहल की है उसमें सबको साथ आना चाहिए। पत्रकार प्रफुल्ल ठाकुर ने भाषा को संप्रेषण का जरिया बताते हुए कहा कि भाषा को भय, श्रेष्ठता और अस्मिताबोध से परे रखकर सहज प्रवाहित होने देना चाहिए।
परिचर्चा का शुभारंभ महात्मा गांधी व डॉ राममनोहर के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। परिचर्चा में अतिथियों का स्वागत मातामणि तिवारी ने व धन्यवाद ज्ञापन लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अशोक पंडा ने किया। गोष्ठी का संचालन वरिष्ठ पत्रकार जयंत तोमर ने किया। आयोजन में श्याम सुंदर सिंह व जावेद उस्मानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इस अवसर पर रायपुर छत्तीसगढ़ के बुद्धिजीवियों सहित अंचल से बड़े पैमाने पर लोग रघुजी को सुनने आये। परिचर्चा में रामसिंह क्षत्रिय, नरसिंह साहू, सोमनाथ साहू, शिव नेताम बंजारे, रामगुलाम ठाकुर, गिरीश पंकज, गिरीश बोरा, वीरेंद्र पांडे और योगेश प्रमुख रूप से मौजूद थे।



