Dussehra 2026: दशहरा यानी विजयादशमी 20 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। यह पर्व भगवान राम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन, पानी में मछली दिखाई देने और नवरात्रि में बोए गए जौ यानी जयंती का आशीर्वाद लेने से जुड़ी लोकमान्यताएं भी प्रचलित हैं। धार्मिक विश्वास में इन परंपराओं को शुभ माना जाता है।
आइए जानते हैं, इन तीनों का क्या महत्व है और विजयादशमी से इनका संबंध कैसे जुड़ा है।
1. दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन क्यों माने जाते हैं शुभ?
विजयादशमी पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने की परंपरा कई जगह प्रचलित है। धार्मिक मान्यता में इस पक्षी को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है। लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि रावण वध से पहले भगवान राम ने नीलकंठ के दर्शन किए थे। इसी विश्वास के चलते दशहरे पर नीलकंठ दिखाई देने को सौभाग्य, सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, यह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास से जुड़ी परंपरा है।
2. दशहरे पर पानी में मछली दिखने का क्या है धार्मिक महत्व?
विजयादशमी के दिन यात्रा के दौरान नदी, तालाब या दूसरे जलस्रोत में मछली दिखाई देने को भी कुछ लोकमान्यताओं में शुभ माना जाता है। इस विश्वास के अनुसार, मछली का दिखना कामकाज में आने वाली बाधाओं के दूर होने और परिवार में खुशहाली का प्रतीक है। यह मान्यता अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित लोकविश्वासों का हिस्सा है। मछली दिखाई देने से भविष्य में कोई निश्चित घटना होने का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
3. नवरात्रि में बोए गए जौ यानी जयंती का क्या है महत्व?
नवरात्रि की शुरुआत में घटस्थापना के समय कई घरों और मंदिरों में जौ बोए जाते हैं। पूजा के दौरान उगने वाले इन हरे जौ को अलग-अलग क्षेत्रों में जयंती या जवारे कहा जाता है।
विजयादशमी के दिन इन जौ को देवी का आशीर्वाद मानकर ग्रहण करने और बड़ों की ओर से सिर पर रखने की परंपरा कुछ स्थानों पर प्रचलित है। श्रद्धालु इसे मां दुर्गा की कृपा, विजय, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़ते हैं। जयंती को शुभ शुरुआत और सफलता का प्रतीक मानने की परंपरा भी इसी धार्मिक विश्वास का हिस्सा है।
डिस्केलमरः दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे मनाने के तरीके और इससे जुड़ी परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं। नीलकंठ के दर्शन, मछली दिखाई देने और जयंती का आशीर्वाद लेने जैसी मान्यताएं इसी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। इन परंपराओं का महत्व लोगों की आस्था और स्थानीय मान्यताओं से जुड़ा है। इन्हें भविष्य में किसी निश्चित परिणाम की गारंटी के बजाय धार्मिक विश्वास के रूप में समझना चाहिए।



