अब तो बैरक में भी बेफिक्री नहीं
अब तो बैरक में भी बेफिक्री नहीं

रायपुर। जवान नक्सल मोर्चे पर जितना खौफ नहीं खाते उतना अब बैरक में खौफ खा रहे हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में आए दिन सीआरपीएफ के जवानों द्वारा आत्महत्या या अपने ही साथियों की हत्या की खबरें सामने आ रही हैं।

देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल में सोमवार को छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा जिले से यह खबर आती है कि चार्ली बटालियन के एक जवान ने तड़के अपने 7 साथी जवानों पर AK-47 से हमला कर दिया। इसमें 4 जवान मारे गए जबकि 3 गंभीर रूप से घायल हो गए। सुकमा में हुई इस घटना ने सारी फोर्स को स्तब्ध कर दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब खुद सीआरपीएफ के डीजी कुलदीप सिंह सुकमा के लिंगापल्ली के चार्ली बटालियन का दौरा कर पूरी स्थिति की गंभीरता को समझने का जिम्मा लिया है।

ऐसा नहीं है कि यह मामला केवल छत्तीसगढ़ का ही है। इससे पहले मंदसौर मध्यप्रदेश के विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में 23 जून 1983 को अपना मानसिक संतुलन खो चुके एक जवान ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी थी, इस घटना में मंदिर के पुजारी, व्यापारी सहित करीब 13 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 9 लोग घायल हो गए थे।

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एक आंकड़ों के मुताबिक 2018 से 2021 के बीच सीआरपीएफ के जवानों के द्वारा अपने साथियों पर 13 बार फायरिंग की अलग- अलग घटनाएं हुई जिसमें 40 जवानों की मौत हो चुकी है। वहीं 192 जवानों ने देश में अलग-अलग घटनाओं में आत्महत्या की हैं। 2021 में अबतक 51 जवानों ने आत्महत्या कर अपनी जान गंवा दी है।

जो हमारी सुरक्षा करने के लिए रात और दिन नहीं देखते उनकी सुरक्षा को लेकर सरकारें कितनी सजग है वर्तमान परिदृश्य में यह सबसे बड़ा सवाल बन खड़ा हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जवानों के शारीरिक स्वास्थ्य का काफी ख्याल रखा जाता है। लेकिन जवानों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्यों वैसा ही ध्यान नहीं दिया गया, या फिर उसे नजरअंदाज किया गया है।

इस तरह की घटनाएं न हो इसके लिए जरूरी है कि जवानों को समय-समय पर मनोवैज्ञानिक सलाह भी दिये जाएं। खसतौर पर तब जब वे छुट्टियों से बैरक लौटते हैं। जवानों में काम का बोझ, परिजनों और बच्चों से दूरी, लगातार एक स्थान से दूसरे स्थानों पर तबादले, बीहड़ और दुर्गम इलाकों में पोस्टिंग जहां न तो इंटरनेट कनेक्टिविटी मिलती और न ही मनोरंजन की सुविधा। अन्य कई कारण हैं जो जवानों में तनाव और अवसाद का कारण बनते हैं।

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जानकार मानते हैं कि इस तरह की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह तनाव होता है। इस तरह की घटनाओं से बचने का एक तरीका ये है कि जवानों की प्रॉपर तरीके से काउंसलिंग की जाए। इसके अलावा जवान की संख्‍या को बढ़ाया जाए। साथ ही उन्‍हें एक अंतराल पर छुट्टी पर जाने की इजाजत मिल सके। साथ ही दुगर्म इलाकों में तैनात जवानों को अपने परिजनों का हाल-चाल जानने का भी पूरा मौका मिलना चाहिए। जवानों को इस बात का अहसास नहीं होना चाहिए कि वो अपने घर से दूर हैं और उन्‍हें जरूरत के समय घर जाने का मौका शायद ही मिलेगा। दरअसल, जवानों का जीवन बेहद कष्‍टमय होता है। ड्यूटी की लंबी अवधि और उस पर सुविधाओं का अभाव, हर वक्‍त खतरा और इन सभी के बीच घर की परेशानी इस तनाव का कारण बनती है।

ऐसे में प्रॉपर काउंसलिंग बेहद जरूरी है। सरकार या जिम्मेदार विभाग को पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के जवानों के मानसिक तनाव को दूर करने के लिए विशेष कदम उठाएं जाने की जरूरत है। ताकि जवान बैरक में खौफ के साये में नहीं बेफिक्री के साथ जी सकें।

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