नवरात्री में मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी

नवरात्रि का आज दूसरा दिन है और इस दिन मां दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना की जाती है। इस त्योहार में भक्त मां की पूजा पूरी विधि-विधान से करते हैं. साथ ही मां के लिए नौ दिनों तक व्रत रखते हैं. मान्यता हैं कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या की थी, उसी तपस्या के कारण माता का ब्रह्मचारिणी नाम पड़ा। आइए जानते हैं नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी पूजा का मंत्र, आरती, भोग और इस दिन पीले रंग का क्या है महत्व…

जानें शुभ मुहूर्त

नवरात्रि के दूसरे दिन पूजा के लिए 2 शुभ मुहूर्त रहेंगे. सुबह 10.17 बजे से सुबह 11.58 बजे तक अमृत काल रहेगा. फिर सुबह 11.44 बजे से दोपहर 12.29 बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा. पूजा के लिए ये दोनों ही मुहूर्त श्रेष्ठ हैं.

मां ब्रह्मचारिणी पूजा विधि

मां दुर्गा की दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी सिद्धि और सफलता की प्रतीक मानी जाती है. इनकी पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है. इस दिन पूजा के समय आपको हरे रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए. पूजा के समय पीले या सफेद रंग के कपड़े का इस्तेमाल करें. मां का अभिषेक पंचामृत से करें और रोली, अक्षत, चंदन, जैसी चीजों का भोग लगाएं. मां ब्रह्मचारिणी को प्रसन्न करने के लिए आप उन्हें चीनी और पंचामृत का भी भोग लगा सकते हैं. मां को गुड़हल और कमल का फूल पसंद हैं। इसके साथ ही मन में माता के मंत्र या जयकारे लगाते रहें। इसके बाद पान-सुपारी भेंट करने के बाद प्रदक्षिणा करें। फिर कलश देवता और नवग्रह की पूजा करें। घी और कपूर से बने दीपक से माता की आरती उतारें और दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा का पाठ करें। पूजा पाठ करने के बाद पूरे परिवार के साथ माता के जयकारे लगाएं। इससे माता की असीम अनुकंपा प्राप्त होगी।

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मां ब्रह्मचारिणी देवी का पूजा मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

दधाना कपाभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।

मां ब्रह्मचारिणी से जुड़ी मान्यता और पीले रंग का महत्व

मां ब्रह्मचारिणी पीला रंग बहुत प्रिय है इसलिए माता की पूजा में पीले रंग के कपड़े पहनकर पूजा करनी चाहिए। साथ ही पीले रंग के वस्त्र और फूल अवश्य अर्पित करने चाहिए। पीला रंग मां के पालन-पोषण करने वाले स्वभाव को दर्शाता है। साथ ही यह रंग सीखने और ज्ञान का संकेत है और उत्साह, खुशी और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार जब माता पार्वती भगवान शिव को अपना वर बनाने के लिए तपस्या पर बैठी थी तो उन्होंने सब कुछ त्याग करके ब्रह्मचर्य अपना लिया था. मां के इसी रूप को ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है. दुर्गा मां की इस रूप की पूजा अविवाहित देवी के रूप में किया जाता है. इनके एक तरफ कमंडल होता है और दूसरी तरफ जप माला होती है. मां को सरलता, शांति और सौम्य रूप में पूजा जाता हैं।

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ऐसे पड़ा ब्रह्मचारिणी नाम

शास्त्रों में बताया गया है कि मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के यहां पुत्री बनकर जन्म लिया और महर्षि नारद के कहने पर अपने जीवन में भगवान महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक अपनी कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी पड़ा। अपनी इस तपस्या की अवधि में इन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर और अत्यन्त कठिन तप से महादेव को प्रसन्न कर लिया। उनके इसी तप के प्रतीक के रूप में नवरात्र के दूसरे दिन इनके इसी रूप की पूजा और स्तवन किया जाता है।

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