UCC: छत्तीसगढ़ में यूसीसी पर सियासी पारा गर्म, कांग्रेस ने आदिवासी अधिकारों को लेकर सरकार को घेरा
रायपुर, 20 जुलाई 2026: छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की चर्चा के बीच राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने एक तीखा बयान जारी कर कहा है कि यदि राज्य में यूसीसी लागू किया जाता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान यहां के आदिवासियों को उठाना पड़ेगा। कांग्रेस का आरोप है कि इस कदम के जरिए आदिवासियों के संवैधानिक संरक्षण और विशेष अधिकारों पर डाका डालने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में केवल आदिवासी वर्ग ही ऐसा है जिसे संविधान के तहत विशेष नागरिक प्रावधान मिले हुए हैं।
आदिवासी आबादी, पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची
इस पूरे मामले के तहत, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 32 प्रतिशत से अधिक है, जिनमें कई संरक्षित जनजातियां भी शामिल हैं। इनके हितों की रक्षा के लिए राज्य में पेसा कानून और संविधान की पांचवीं अनुसूची प्रभावी हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि जब से बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा और शांति का माहौल बना है, तब से उद्योगपतियों की नजर वहां की जमीन पर गड़ गई है। चूंकि मौजूदा कानूनों के तहत कोई आसानी से आदिवासियों की जमीन नहीं छीन सकता, इसलिए यूसीसी को एक हथकंडे के रूप में लाया जा रहा है ताकि औद्योगिक घरानों के हितों को बढ़ावा दिया जा सके।
आदिवासी मुख्यमंत्री के कार्यकाल पर सवाल
दीपक बैज ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि राज्य के मुखिया खुद एक आदिवासी समुदाय से आते हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक आदिवासियों के हितों के खिलाफ निर्णय लेने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस ने सरकार के सामने चार मुख्य सवाल रखे हैं: क्या यूसीसी लागू होने के बाद पेसा कानून का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा? क्या पांचवीं अनुसूची के तहत पंचायतों के अधिकारों से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी? क्या बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबूझमाड़िया, भुंजिया और पंडो जैसी संरक्षित जनजातियों के विशेष संवैधानिक अधिकार सुरक्षित बच पाएंगे? और क्या आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों का हनन रोका जाएगा?
राजनीतिक दलों और नेताओं के आधिकारिक रुख
इस बयान के बाद राज्य का राजनीतिक गलियारा गर्मा गया है। कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने स्पष्ट किया है कि पार्टी आदिवासियों के अधिकारों के हनन को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी। हालांकि, इस पर सत्ता पक्ष या भाजपा की ओर से अभी तक विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति का एक बड़ा केंद्र बनेगा।
जनजीवन, शासन और भावी राजनीतिक प्रभाव
इस वैचारिक और राजनीतिक टकराव का सीधा असर राज्य की कानून-व्यवस्था, नीतियों और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ सकता है। यदि यूसीसी को लेकर बहस और तेज होती है, तो आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन या आंदोलनों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इसका असर आगामी प्रशासनिक निर्णयों और क्षेत्रीय विकास योजनाओं की गति पर भी देखने को मिल सकता है।
संक्षेप में कहें तो, यूसीसी के मुद्दे पर कांग्रेस ने सरकार को घेरते हुए आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग की है। इस संवेदनशील मामले पर शासन-प्रशासन और राजनीतिक दलों की ओर से आगे क्या रुख अपनाया जाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी और इससे जुड़ी हर नई अपडेट समय पर सामने आएगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- छत्तीसगढ़ में यूसीसी को लेकर किसने बयान दिया है?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने यूसीसी को लेकर बयान जारी किया है।
- कांग्रेस के अनुसार यूसीसी से किसे सबसे ज्यादा नुकसान होगा?
कांग्रेस का कहना है कि इससे छत्तीसगढ़ के 32 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी और उनके अधिकारों को नुकसान पहुंचेगा।
- आदिवासियों के संरक्षण के लिए राज्य में कौन-से कानून लागू हैं?
आदिवासियों के संरक्षण के लिए पेसा कानून और संविधान की पांचवीं अनुसूची लागू है।
- कांग्रेस ने सरकार के सामने कौन-सी मुख्य शंकाएं उठाई हैं?
कांग्रेस ने पेसा कानून, पांचवीं अनुसूची के अधिकारों और संरक्षित जनजातियों के विशेष संरक्षण पर मंडराते खतरे को लेकर सवाल किए हैं।


