बिलासपुर हाईकोर्ट भवन की बाहरी तस्वीर और कानूनी न्याय का प्रतीक
बिलासपुर हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार कानून के तहत जुर्माने की प्रक्रिया पर बड़ा आदेश जारी किया है।

टीआरपी डेस्क। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट पहुंचाने वाली 3,056 करोड़ रुपये की भारतनेट फेज-2 परियोजना अब कानूनी भंवर में फंस गई है। टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की याचिका पर बिलासपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की पीठ ने लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

यह विवाद छत्तीसगढ़ की 6,000 ग्राम पंचायतों तक पहुंचने वाली हाई-स्पीड इंटरनेट सेवा के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। अगर कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचती है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सेवाओं का विस्तार और मौजूदा नेटवर्क का रखरखाव (Maintenance) अधर में लटक सकता है।

क्या है पूरा मामला?

साल 2018 में छत्तीसगढ़ इन्फोटेक प्रमोशन सोसायटी (चिप्स) और टाटा प्रोजेक्ट्स के बीच इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए समझौता हुआ था। कंपनी का आरोप है कि काम के दौरान खुदाई की अनुमति समय पर नहीं मिली, बैंक गारंटी गलत तरीके से भुना ली गई और किए गए काम का भुगतान भी रोक दिया गया। इन्ही विवादों के चलते टाटा प्रोजेक्ट्स ने मई 2025 में अपना अनुबंध समाप्त कर दिया था।कंपनी चाहती है कि इस मामले के निपटारे के लिए एक मध्यस्थता ट्रिब्यूनल (Arbitration Tribunal) का गठन हो, जिसमें हाईकोर्ट की देखरेख में पंचों की नियुक्ति की जाए।

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सरकार और चिप्स का तर्क

सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार ने टाटा की याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकार का तर्क है कि यह एक ‘वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट’ है, इसलिए इस पर सामान्य मध्यस्थता कानून के बजाय छत्तीसगढ़ मध्यस्थम् अधिकरण अधिनियम, 1983 लागू होता है। साथ ही, सरकार ने सवाल उठाया कि यह प्रोजेक्ट एक कंसोर्टियम (साझेदारी) का था, तो टाटा प्रोजेक्ट्स अकेले याचिका कैसे दायर कर सकती है।