रायपुर। इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर्स की भर्ती में जमकर फर्जीवाड़ा किया गया है। ये जानकारी विश्वविद्यालय के जानकार सूत्रों ने दी। जानकारों ने बताया कि मामला लोकसभा चुनाव से पहले लगी आदर्श आचार संहिता के पहले का बताया जा रहा है।

इसमें 150 पदों पर हुई भर्तियों में जमकर मनमानी की गई है। इसमें एससी के 99 और एसटी के 52 पदों पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की भर्ती कर दी गई। तो इस पर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार जीके. निर्मम का कहना है कि उनको इसकी जानकारी ही नहीं है।

अब जानकारी मिली है तो फाइल मंगवाकर देखते हैं। तो वहीं विश्वविद्यालय के जानकार बताते हैं कि ये सारी भर्तियां उन्हीं के साइन किए दस्तावेजों से की गई हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि आखिर इनमें सच कौन बोल रहा है? तो दूसरा सवाल ये भी है कि जब पात्र उम्मीदवार थे तो फिर अपात्रों को क्यों भर्ती किया गया?

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ऐसे में अगर कार्यवाही होने पर इनको अपात्र मानकर सेवामुक्त किया गया तो क्या इनको भुगतान किए गए वेतन की रिकवरी की जाएगी? अगर हां तो कैसे और यदि नहीं की जाएगी तो क्यों? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जो इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के सामने सिर उठाए खड़े हैं और प्रबंधन अंगूठे से जमीन खुरच रहा है।

कैसे किया गया ये फर्जीवाड़ा:

दरअसल 30% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। इन पर 5 महिलाओं ने आवेदन भी किया था, मगर उन सीटों पर ओबीसी के पुरुष उम्मीदवारों को नौकरियां बांट दी गर्इं। तो वहीं भूतपूर्व सैनिकों के लिए कोई सीट ही आरक्षित नहीं रखी गई।

बैकलॉग पदों की तो भर्तियां ही नहीं हुर्इं:

नियम-कायदे के अनुसार अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति की सीटों पर ओबीसी और अनारक्षित उम्मीदवारों को भर्ती नहीं किया जा सकता है। इन सीटों पर भर्ती नहीं होने पर नए विज्ञापन में इसे बैकलॉग पदों के रूप में जारी किया जाता है। जब कि अनारक्षित वर्ग की सीटों पर कोई भी उम्मीदवार नौकरी कर सकता है।

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कनिष्ठ वैज्ञानिक पद पर भर्ती हुए कुलपति की श्रेणी का उल्लेख ही नहीं:

इस दरम्यान एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। दरअसल मृदा विज्ञान की डिग्री लेने वाले कुलपति एसके पाटिल का जिक्र आरक्षण रोस्टर में कहीं नहीं है। इसमें सभी लोगों का नाम- और जन्मतिथि अंकित है मगर कुलपति का नाम इसमें नहीं दर्ज किया गया। जब कि जानकार बताते हैं कि डॉ. संजय कुमार पाटिल की नियुक्ति बतौर कनिष्ठ वैज्ञानिक के दौर पर हुई थी।

जन्म तिथियों को लेकर भी किया गया तमाशा:

विश्वविद्यालय में नियम विरुध्द नियुक्तियां देते समय जन्म तिथियों को लेकर भी हेरफेर किया गया है। एक ही आदेश को दो-दो बार निकाला गया है। इनमें जन्म तिथि ही बदली हुई थी। पहली सूची में दसवीं की मार्कशीट में जन्म तिथि सन 1958 थी तो दूसरी सूची में 5 साल कम दर्शाई गई है। ऐसे में सवाल तो यही है कि और क्या-क्या बदला गया?

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