Ibn-e-Insha, Cursed Ghazal: क्या कोई गीत या गजल इतनी ‘शापित’ हो सकती है कि उसे गाने या लिखने वाले हर शख्स की अचानक मौत हो जाए? यह सवाल सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन 70 के दशक की एक उर्दू गजल से जुड़ा इतिहास कुछ ऐसी ही खौफनाक दायां बयां करता है। उर्दू के महान शायर इब्न-ए-इंशा की लिखी गजल ‘इंशा-जी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी को लगाना क्या’ को फनकारों की दुनिया में ‘शापित’ माना जाता है।
इस गजल का अजीब इत्तेफाक यह है कि इसे लिखने वाले शायर, इसे पहली बार आवाज देने वाले उस्ताद गायक, उनके बेटे, परिवार के अन्य सदस्य और इसके निर्माता (प्रोड्यूसर) समेत कुल 5 लोगों की अचानक मौत हो गई। आज भी इस खौफनाक सिलसिले के कारण कई बड़े कलाकार इस गजल को अपनी जुबान पर लाने से कतराते हैं।
कौन थे महान शायर और व्यंग्यकार इब्न-ए-इंशा?
शेर मोहम्मद खान यानी इब्न-ए-इंशा का जन्म 15 जून 1927 को हुआ था। वे अपनी बेहतरीन शायरी और अनूठे व्यंग्य के लिए दुनिया भर में जाने जाते थे। उनकी भाषा-शैली में अमीर खुसरो की सी झलक मिलती थी। ‘उर्दू की आखिरी किताब’ जैसी उनकी रचनाएं आज भी बेहद लोकप्रिय हैं, लेकिन उनकी एक रचना उनके अपने ही जीवन पर भारी पड़ गई।
‘शापित’ गजल के बोल?
इब्न-ए-इंशा की यह चर्चित गजल इन पंक्तियों से शुरू होती है- “इंशा-जी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी को लगाना क्या। वहशी को सुकूं से क्या मतलब, जोगी का नगर में ठिकाना क्या।” इस गजल में संसार से विरक्ति और मोह-माया छोड़ने की बात कही गई है। खुद शायर ने अपनी मौत से एक दिन पहले लिखा था कि यह मनहूस गजल कितनों की जान लेगी।
उस्ताद अमानत अली खान और कैंसर से इब्न-ए-इंशा की मौत
इस गजल को जनवरी 1974 में पटियाला घराने के मशहूर गायक उस्ताद अमानत अली खान ने पाकिस्तान टीवी पर गाया था। इसके महज कुछ महीनों बाद ही 52 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। इसके ठीक चार साल बाद जनवरी 1978 में लंदन के अस्पताल में कैंसर से जूझ रहे इब्न-ए-इंशा ने भी अंतिम सांस ली, ठीक एक दिन पहले उन्होंने इस गजल का जिक्र किया था।
पिता की तरह बेटे की भी हुई रहस्यमयी और अचानक मौत
सिलसिला यहीं नहीं थमा। साल 2006 में उस्ताद अमानत अली खान के बेटे असद अमानत अली ने एक कॉन्सर्ट में इसी गजल को गाया। हैरान करने वाली बात यह रही कि कुछ ही महीनों बाद, ठीक 52 साल की उम्र में उनकी भी अचानक मौत हो गई, जो उनके पिता की उम्र का ही पड़ाव था।
प्रोड्यूसर और परिवार के अन्य सदस्यों पर भी टूटा कहर
उस्ताद अमानत अली खान के सबसे बड़े बेटे अमजद अली खान भी इस गजल को गाते थे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसके अलावा इस गजल के निर्माण से जुड़े प्रोड्यूसर साहब की भी अचानक मौत हो गई। उनके बेटे और मशहूर गायक शफाकत अमानत अली भले ही अंधविश्वास में यकीन न रखते हों, लेकिन पारिवारिक हिदायत के बाद उन्होंने इस गजल को कभी न गाने का फैसला किया है।
- ‘इंशा-जी उठो अब कूच करो’ गजल के रचयिता मशहूर उर्दू शायर, लेखक और व्यंग्यकार इब्न-ए-इंशा (शेर मोहम्मद खान) हैं।
- इस गजल को सबसे पहले जनवरी 1974 में पटियाला घराने के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अमानत अली खान ने गाया था।
- इब्न-ए-इंशा की मृत्यु 11 जनवरी 1978 को कैंसर के कारण लंदन के एक अस्पताल में हुई थी।
- उस्ताद अमानत अली खान और उनके बेटे असद अमानत अली का निधन ठीक 52 वर्ष की आयु में अचानक हुआ था।
- उस्ताद अमानत अली खान के बेटे और जाने-माने गायक शफाकत अमानत अली इस गजल को गाने से परहेज करते हैं।



