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हाईकोर्ट ने एक और आयोग को दिखाया आईना, कहा– सजा प्रस्तावित कर सकता आयोग, जानें और क्या कहा कोर्ट ने

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बार फिर संवैधानिक आयोगों की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए छत्तीसगढ़ लोक आयोग को आईना दिखाया है। हाईकोर्ट ने लोक आयोग द्वारा करीब 8 साल पुराने अपने ही दो आदेशों में संशोधन कर आयोग की शक्तियों पर की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया […]

हाईकोर्ट ने एक और आयोग को दिखाया आईना, कहा– सजा प्रस्तावित कर सकता आयोग, जानें और क्या कहा कोर्ट ने
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बार फिर संवैधानिक आयोगों की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए छत्तीसगढ़ लोक आयोग को आईना दिखाया है। हाईकोर्ट ने लोक आयोग द्वारा करीब 8 साल पुराने अपने ही दो आदेशों में संशोधन कर आयोग की शक्तियों पर की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।

जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने कहा कि यह संशोधन की मांग नहीं, बल्कि पुराने मामले को फिर से खोलने की कोशिश है। कोर्ट के इस आदेश ने एक बार फिर सरकार द्वारा गठित आयोगों को उनके कार्यक्षेत्र की सीमाओं को लेकर सतर्क किया है।

क्या है पूरा मामला? 

यह प्रकरण जल संसाधन विभाग में नाली निर्माण और लाइनिंग कार्य में अनियमितता से जुड़ा है।

– शिकायत के आधार पर लोक आयोग ने जांच की और 17 सितंबर 2012 को कहा कि तीन अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत से सरकारी खजाने को 30,51,857.55 रुपये की क्षति हुई है।

– आयोग ने तीनों के खिलाफ बड़े दंड की विभागीय कार्रवाई और राशि वसूली की अनुशंसा की और 3 महीने में अनुपालन रिपोर्ट मांगी।

– इसी अनुशंसा के आधार पर राज्य सरकार ने सब इंजीनियर जीएस ठाकुर, मुंगेली से कुल नुकसान का एक तिहाई 10,17,285.55 रुपये वसूलने का आदेश 4 अक्टूबर 2012 को जारी कर दिया।

इसी से जुड़े विक्टर मिंज, अंबिकापुर ने भी वसूली आदेश को चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट ने 2018 में ही वसूली आदेश को कर दिया था रद्द

जीएस ठाकुर ने 2012 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 3 जुलाई 2018 को जस्टिस पी. साम कोशी की बेंच ने याचिका स्वीकार करते हुए लोक आयोग और राज्य सरकार दोनों के आदेश रद्द कर दिए थे।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की थी — “केवल लोक आयोग की अनुशंसा के आधार पर सीधे वसूली का आदेश जारी नहीं किया जा सकता।” राज्य सरकार ने वसूली से पहले शो-कॉज नोटिस, प्रारंभिक जांच या पक्ष रखने का मौका नहीं दिया था। सरकार को पहले यह तय करना होगा कि वास्तव में नुकसान हुआ भी है या नहीं।

विक्टर मिंज की याचिका भी इसी आधार पर स्वीकृत हुई थी।

कोर्ट ने कहा था – आयोग सजा प्रस्तावित नहीं कर सकता

3 जुलाई 2018 के आदेश के पैरा-9 में हाईकोर्ट ने लोक आयोग की शक्तियों पर अहम टिप्पणी की थी — आयोग शिकायत पर जांच कर अपने निष्कर्ष राज्य सरकार को भेज सकता है। इसके बाद राज्य सरकार को लागू सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी होगी। आयोग किसी अधिकारी को दी जाने वाली सजा प्रस्तावित नहीं कर सकता और न ही अनुपालन रिपोर्ट मांग सकता है।

हालांकि आदेश के अंतिम पैरे में कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिका मंजूर होने का अर्थ यह नहीं कि राज्य सरकार कानून के अनुसार कार्रवाई नहीं कर सकती।

8 साल बाद जागा लोक आयोग

इसी टिप्पणी को हटाने के लिए लोक आयोग ने 2019 में दो आवेदन दायर किए। अधिवक्ता ए.के. सामंत्रे ने दलील दी कि यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 11(2) और 11(3) के विपरीत है और आदेश में विरोधाभास है।

हाई कोर्ट का ताजा फैसला – अपील करते, संशोधन नहीं

जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने कहा — आयोग की आपत्ति केवल भाषा की त्रुटि तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 2018 के कानूनी निष्कर्षों को ही चुनौती दे रहा है। यदि आपत्ति थी तो अपील का वैधानिक रास्ता अपनाना चाहिए था, न कि संशोधन के जरिए रिट की दोबारा सुनवाई। इस टिप्पणी के साथ दोनों आवेदन खारिज कर दिए गए।

FAQ:; अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

Q1. हाईकोर्ट ने लोक आयोग की कौन सी मांग खारिज की है?

— छत्तीसगढ़ लोक आयोग ने 3 जुलाई 2018 के दो आदेशों (जीएस ठाकुर और विक्टर मिंज केस) के पैरा-9 में आयोग की शक्तियों पर की गई टिप्पणी – “आयोग सजा प्रस्तावित नहीं कर सकता और अनुपालन रिपोर्ट नहीं मांग सकता” – को हटाने/संशोधित करने की मांग 2019 में की थी। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने इसे 8 साल पुराने मामले को फिर खोलने की कोशिश बताते हुए खारिज कर दिया।

Q2. जीएस ठाकुर और विक्टर मिंज का मामला क्या था?

— जल संसाधन विभाग में नाली निर्माण/लाइनिंग में अनियमितता की शिकायत पर लोक आयोग ने 17 सितंबर 2012 को 30,51,857.55 रुपये की क्षति बताकर बड़े दंड और वसूली की अनुशंसा की। राज्य सरकार ने 4 अक्टूबर 2012 को जीएस ठाकुर से 10,17,285.55 रुपये वसूलने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2018 को कहा बिना नोटिस और जांच के सीधी वसूली गलत है और दोनों आदेश रद्द कर दिए।

Q3. हाईकोर्ट ने लोक आयोग की शक्तियों पर क्या स्पष्ट किया?

— कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम 2002 के तहत आयोग केवल जांच कर निष्कर्ष और अनुशंसा राज्य सरकार को भेज सकता है। सजा प्रस्तावित करना और अनुपालन रिपोर्ट मांगना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। अंतिम कार्रवाई सेवा नियमों के तहत राज्य सरकार को ही करनी होगी।

Shami Imam
लेखक / पत्रकार:

Shami Imam

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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