Government Bank Job Resignation: सरकारी बैंक की नौकरी को आमतौर पर करियर, अच्छी आय और अच्छे भविष्य से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन पश्चिम बंगाल की 31 वर्षीय मधुरिमा का अनुभव इससे बिल्कुल अलग रहा। करीब दो साल तक परीक्षा की तैयारी के बाद मिली नौकरी में लंबे काम के घंटे, लगातार दबाव और ब्रेक की कमी ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दीं।
मधुरिमा ने करीब दो साल तक बैंकिंग परीक्षा की तैयारी की थी। अक्टूबर 2022 में उनका चयन एक सरकारी बैंक में हुआ और ग्रामीण कर्नाटक की शाखा में नियुक्ति मिली। उन्हें हर महीने करीब 70 हजार रुपये हाथ में मिलते थे। नौकरी के साथ लगभग नौ महीने की अनिवार्य प्रशिक्षण अवधि भी पूरी करनी थी।
सुबह साढ़े आठ से रात साढ़े दस बजे तक काम
मधुरिमा के मुताबिक, बैंक में काम के दौरान कई बार उनकी ड्यूटी सुबह करीब साढ़े आठ बजे से रात साढ़े दस बजे के बाद तक चली जाती थी। उन्होंने दावा किया कि रविवार को भी काम करना पड़ता था। लगातार काम के दबाव के कारण वह मानसिक रूप से परेशान रहने लगी थीं और कई बार काम के बाद रोती थीं।
कई घंटों तक वॉशरूम जाने का नहीं मिलता था समय
मधुरिमा ने बताया कि नकदी काउंटर की जिम्मेदारी के दौरान लंबे समय तक अपनी जगह से उठना मुश्किल होता था। ग्राहकों का काम सुबह करीब 10 बजे शुरू होने के बाद दोपहर तक लगातार चलता रहता था। उनके अनुसार, कई बार उन्हें घंटों तक न तो ठीक से ब्रेक मिल पाता था और न ही वॉशरूम जाने का मौका मिलता था।
स्वास्थ्य पर पड़ा काम का असर
लंबे समय तक ब्रेक नहीं मिलने और वॉशरूम जाने में परेशानी के कारण मधुरिमा ने स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने का दावा किया। उनके मुताबिक, उन्हें संक्रमण की समस्या हो गई थी। इसके साथ ही लगातार काम और छुट्टी नहीं मिलने की परेशानी ने उनकी नौकरी को लेकर असंतोष और बढ़ा दिया।
शादी के कुछ दिन बाद ही लौटना पड़ा
मधुरिमा ने दिसंबर 2022 में शादी की थी। लेकिन शादी के कुछ ही दिनों बाद उन्हें वापस लौटना पड़ा। उनका कहना है कि इस वजह से वह अपने पति और ससुराल वालों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता सकीं। नौकरी की जिम्मेदारियों और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाना उनके लिए मुश्किल होता गया।
कैश काउंटर के साथ दूसरे कामों का भी प्रेशर
मधुरिमा के अनुसार, उनकी मुख्य जिम्मेदारी कैश काउंटर संभालना थी, लेकिन इसके अलावा नए ग्राहक जोड़ने और खाते खुलवाने जैसे काम भी दिए जाते थे। कई बार काउंटर बंद करने के बाद उन्हें बाहर जाकर ग्राहकों से संपर्क करने के लिए कहा जाता था।
दूसरी भाषा की वजह से बढ़ी परेशानी
ग्रामीण कर्नाटक में नियुक्ति के दौरान भाषा भी उनके लिए चुनौती बनी। मधुरिमा के मुताबिक, उन्हें कन्नड़ भाषा नहीं आती थी। ऐसे में स्थानीय लोगों से संपर्क करना और नए ग्राहकों को जोड़ना उनके लिए और मुश्किल हो जाता था। काम की अतिरिक्त जिम्मेदारियों के बीच यह चुनौती उनके तनाव को और बढ़ाती थी।
नौकरी छोड़ने के लिए चुकाने पड़े 2 लाख रुपये
लगातार बढ़ते काम के दबाव के बीच मधुरिमा ने बैंक की नौकरी छोड़ने का फैसला किया। लेकिन नौकरी छोड़ना भी उनके लिए आसान नहीं था। उनके मुताबिक, उन्हें सेवा संबंधी बांड के तहत करीब 2 लाख रुपये की राशि चुकानी पड़ी। यानी नौकरी छोड़ने के लिए उन्हें अपनी बचत से बड़ी रकम देनी पड़ी।
अब बेंगलुरु की कंपनी में कर रही हैं काम
मधुरिमा अब बेंगलुरु की एक नई कंपनी में काम कर रही हैं। शुरुआत में उनकी आय बैंक की नौकरी के मुकाबले लगभग आधी रह गई थी। हालांकि उनका कहना है कि नई जगह का कामकाजी माहौल बेहतर है। उनके मुताबिक, नए प्रबंधक ने उन्हें सहयोग दिया और अब उनकी मासिक सैलरी बढ़कर करीब 60 हजार रुपये हो गई है।



