टीआरपी डेस्क। India’s Richest Religious Guru’s : सदियों से भारत आध्यात्मिकता की भूमि रहा है और अन्य संस्कृतियों और परंपराओं के विपरीत, यहां कोई एक प्राधिकार या नियम नहीं है जो सिद्धांतों और प्रथाओं को परिभाषित करता हो। इसका अर्थ है कि उपदेशक, धर्मगुरु जिनकी अपनी-अपनी शैलियां, जीवनशैली, दर्शन और आदर्श हैं वे अपने अनुयाईयों को धर्म का ज्ञान देते रहते है और उन्हें मानने वाले श्रद्धालु उन्हें गुरुदक्षिणा के रूप धन अर्पण सरते रहते हैं।

ऐसे आध्यात्मिक गुरुओं ने वर्षों से भक्तों का विशाल समूह बनाया है, साथ ही इस प्रक्रिया में अपार धन, प्रसिद्धि और शक्ति भी अर्जित की है। उन्होंने यह उपलब्धि लाखों लोगों को आध्यात्मिक पथ पर मार्गदर्शन देकर, साथ ही आध्यात्मिक ज्ञान के मूल सिद्धांतों को संरक्षित करके और जन-जन तक पहुंचाकर प्राप्त की है। तो आईए जानते हैं भारत के 10 सबसे अमीर धर्म गुरु कौन हैं।

आचार्य बालकृष्ण

आचार्य बालकृष्ण भारतीय आध्यात्मिक और व्यावसायिक जगत की एक प्रतिष्ठित हस्ती हैं, पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के सह-संस्थापक और प्रबंध निदेशक के रूप में अपनी भूमिका के लिए जाने जाते हैं। साल 2006 में, आचार्य बालकृष्ण और बाबा रामदेव ने मिलकर ‘पतंजलि आयुर्वेद’ की स्थापना की। बाबा रामदेव के करीबी सहयोगी होते हुए बालकृष्ण ने पतंजलि को भारत के फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) क्षेत्र में एक प्रमुख कंपनी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आचार्य बालकृष्ण का जन्म 4 अगस्त 1972 को हरिद्वार उत्तराखंड भारत में हुआ। उन्होंने संस्कृत में आयुर्वेदिक औषधियों और जड़ी-बूटियों के ज्ञान में निपुणता प्राप्त की और इसका प्रचार-प्रसार का कार्य करते रहे हैं। उनका जन्म दिवस पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट से जुड़े लोग ‘जड़ी-बूटी दिवस’ के रूप में मनाते हैं।

आर्थिक रूप से, आचार्य बालकृष्ण की पतंजलि आयुर्वेद में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। उनकी वर्तमान कुल संपत्ति ₹19,200 करोड़ है। अपने विशाल वित्तीय संसाधनों के साथ, आचार्य बालकृष्ण एक प्रसिद्ध परोपकारी भी हैं, जो अक्सर आयुर्वेदिक अनुसंधान, आध्यात्मिक शिक्षा जैसे उल्लेखनीय कार्यों के लिए दान देते हैं।

स्वामी नित्यानंद

भारतीय आध्यात्मिक जगत में स्वामी नित्यानंद निस्संदेह देश के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक नेताओं में से एक हैं। स्वामी नित्यानंद का जन्म तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में शैव वेल्लाल समुदाय के एक घर पर हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका नाम अरुणाचलम राजशेखरन रखा था। उनकी जन्मतिथि के बारे में स्रोतों में विरोधाभास है, 2003 के संयुक्त राज्य अमेरिका के वीजा में 13 मार्च 1977 की तारीख दी गई थी, जबकि 2010 के कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक मामले में दिए गए शपथ पत्र में 1 जनवरी 1978 का उल्लेख था।

स्वामी नित्यानंद वैसे तो भारत से भगोड़ा घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन वे अब भी नित्यानंद ध्यानपीठम के संस्थापक हैं, यह एक ट्रस्ट है जो कई देशों में मंदिरों, गुरुकुलों और आश्रमों का संचालन करता है। स्वामी नित्यानंद कैलासा नामक सूक्ष्म राष्ट्र के संस्थापक प्रमुख भी हैं। उन्होंने इक्वाडोर के तट पर एक द्वीप हासिल कर और कैलासा नाम से अपना देश शुरू किया है। हालांकि कैलासा के संयुक्त राज्य को अभी तक कोई आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके संस्थापक और शासक दुनिया के सबसे धनी आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं, भले ही वे सबसे विवादास्पद क्यों न हों।

हालांकि उनकी व्यक्तिगत संपत्ति का सही आंकलन करना कठिन है, क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा उनके संगठन नित्यानंद ध्यानपीठम के पास है, लेकिन मोटे अनुमान बताते हैं कि इस संगठन के पास ₹10,000 करोड़ की अपार संपत्ति है।

डॉ. पॉल दिनाकरन

डॉ. पॉल दिनाकरन चेन्नई के एक भारतीय ईसाई पादरी और प्रचारक हैं। उन्होंने 18 वर्ष की आयु से ही पादरी के रूप में अपनी सेवाएं देना शुरू कर दिया था। उनका परिवार एक ईसाई धार्मिक परिवार है। उनकी पत्नी इवांगेलिन पॉल दिनाकरन एक ईसाई परोपकारी हैं। उनके पुत्र सैमुअल और पुत्री स्टेला रमोला दिनाकरन (स्वीटी) धार्मिक गायक हैं। 1986 में, पॉल दिनाकरन और उनके पिता डी.जी.एस. दिनाकरन ने करुणा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। पॉल दिनाकरन ने मद्रास विश्वविद्यालय से विज्ञापन में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है।

भारत में अपने ईसाई धर्म प्रचार कार्यों के लिए प्रसिद्ध पॉल दिनाकरन, देश के आध्यात्मिक नेताओं में एक हैं। जीसस कॉल्स मिनिस्ट्री के प्रमुख के रूप में उन्होंने हिंदू और सिख गुरुओं से प्रभावित क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान बनाया है। दिनाकरन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण ईसाई धर्म में गहराई से निहित है। वे अपने टेलीविजन प्रार्थना सत्रों और आध्यात्मिक सभाओं के लिए प्रसिद्ध हैं, जहां वे चंगाई और भविष्यवाणियां करने का दावा करते हैं।

See also  कोल एरिया की जर्जर सड़कों को लेकर शुरू की गई आर्थिक नाकेबंदी, भारी वाहनों का आवागमन किया गया बाधित

इसके अलावा, दिनाकरन ने भारत में 29 स्थानों और दुनिया भर में 9 अन्य स्थानों पर प्रार्थना टावर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन सभी का उद्देश्य भारत समेत दुनियाभर के देशों में ईसाई धर्म में गहराई का प्रचार प्रसार करना है।

एक प्रमुख हिंदू राष्ट्र में भी, पॉल की संपत्ति काफी बढ़ गई है, हालांकि इसकी वास्तविक सीमा सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन मोटे अनुमान बताते हैं कि यह लगभग ₹5,000 करोड़ है, जो उन्हें देश के सबसे धनी धर्म गुरुओं में से एक बनाता है। उन्होंने अपनी विशाल संपत्ति का उपयोग कोयंबटूर स्थित करुणा विश्वविद्यालय सहित विभिन्न धर्मार्थ गतिविधियों के लिए किया है।

श्री माता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा)

श्री माता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा) अपने निस्वार्थ प्रेम और करुणा के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। उन्होंने अपना जीवन गरीबों और पीड़ितों की सेवा और आम आदमी के आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है। अपने निस्वार्थ प्रेम भरे शब्दों, अपने गहरे आध्यात्मिक सार और दुनिया भर में फैले अपने सेवा संगठनों के माध्यम से अम्मा समाज में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।

अमृतानंदमयी देवी का जन्म 27 सितंबर, 1953 को केरल के पश्चिमी तट पर अलप्पुझा गांव में हुआ। उनके माता-पिता ने उनका नाम ‘सुधा मणि’ रखा। आमतौर पर बच्चे जन्म के समय रोते हैं, लेकिन सुधामणि के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान देखी गई थी (मानो वह दुनिया को खुशी और शांति का संदेश दे रही हों) 5 साल की होने से पहले ही सुधामणि ने भगवान कृष्ण की स्तुति में भक्ति भजनों की रचना शुरू कर दी थी। ये गीत गहरी भक्ति और गहन आध्यात्मिक सार से भरे हुए थे। सुधामणि जब 9 वर्ष की हुईं तो मां की तबीयत बिगड़ने के चलते उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा।

केरल की मशहूर संत माता अमृतानंदमयी जिन्हें आमतौर पर ‘अम्मा’ कहा जाता है, अमृतानंदमयी ट्रस्ट की संस्थापक हैं और इसकी देखरेख भी करती हैं। इस ट्रस्ट की संपत्ति लगभग ₹2500 करोड़ बताई जाती है। अमृतानंदमयी ट्रस्ट शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यों में सक्रिय है। देश-विदेश में उनके लाखों भक्त हैं जो उनकी सेवा भावना और करुणा को मानते हैं। अमृतानंदमयी ट्रस्ट का कार्यालय केरल के कोल्लम जिले के अलप्पड पंचायत में स्थित है।

बाबा रामदेव

बाबा रामदेव का जन्म 1965 में हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के अलीपुर गांव में हुआ था। उन्होंने शहजादपुर के एक स्कूल में आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की। छोटी उम्र से ही उन्हें योग में रुचि थी और उन्होंने आर्य गुरुकुल, खानपुर में प्रवेश लिया, जहां उन्होंने संस्कृत, भारतीय शास्त्रों और योग का अध्ययन किया। उन्होंने ‘योगिक साध’ नामक पुस्तक पढ़ील और इससे प्रभावित होकर उन्होंने संन्यास अपनाने का फैसला किया। उन्हें स्वामी शंकरदेवजी महाराज द्वारा सन्यासी क्रम में दीक्षा दी गई और संन्यासी बनने के बाद, रामकृष्ण यादव ने “बाबा रामदेव” नाम अपनाया।

इसके बाद वे जींद जिले में गए और उन्होंने कलवा गुरुकुल में प्रवेश लिया, जहां से उन्होंने संस्कृत व्याकरण, योग, दारुण, वेद और उपनिषदों में विशेषज्ञता के साथ स्नातकोत्तर (आचार्य) की उपाधि प्राप्त की।

बाबा रामदेव ने योग को बढ़ावा देने के लिए 1995 में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की स्थापना की। इस आश्रम में बाबा रामदेव मुख्य रूप से योग सिखाते थे। साल 2000 में बाब रामदेव ने पतांजली के आयुर्वेदिक दवाओं से लेकर फूड प्रोडक्ट्स के जरिए लोगों तक पहुंचाने के बारे में योजनाएं बनाने का सिलसिला शुरू किया और वॉलेंटियर्स के जरिए कारोबार को फैलाना शुरू हुआ। वॉलेंटियर्स और योग सिखाने वालों के नेटवर्क ने धीरे-धीरे डिस्ट्रीब्यूशन चैनल का रूप ले लिया और अब इस कंपनी की बाजार में पहचान से कोई भी अंजान नहीं है।

योग गुरू और अब भारत के बड़े उद्यमियों में से एक बाबा रामदेव की अनुमानित कुल संपत्ति लगभग ₹1,600 करोड़ आंकी गई है।

गुरमीत राम रहीम सिंह

गुरमीत राम रहीम सिंह, जिन्हें अक्सर “संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इंसान” के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु हैं और उन्हें एक विवादास्पद व्यक्ति कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। 2017 में अपनी दोषसिद्धि तक वे सामाजिक संगठन डेरा सच्चा सौदा (DSS) के प्रमुख थे। DSS के प्रमुख के रूप में उनके कार्यकाल में संगठन के अनुयायियों और गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, साथ ही कई विवाद और कानूनी मुकदमें भी चले।

See also  हवाई यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी, सरकार ने दी विमान में इंटरनेट उपयोग करने की मंजूरी

India’s Richest Religious Guru’s : अध्यात्म के प्रति गुरमीत राम रहीम का दृष्टिकोण अपरंपरागत और उदार था। उन्होंने आध्यात्मिकता के तत्वों को मनोरंजन के साथ मिलाने का प्रयास किया और अक्सर स्व-निर्मित फिल्मों और संगीत वीडियो में अभिनय किया। उनके इस दृष्टिकोण ने युवा वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया, लेकिन उनकी दिखावटी जीवनशैली के लिए उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी।

आर्थिक रूप से, उनके नेतृत्व में DSS कई व्यावसायिक उपक्रमों में शामिल था, जिनमें फिल्में, संगीत और स्वास्थ्य एवं कल्याण से संबंधित कार्य शामिल थे। ये उपक्रम राजस्व का एक बड़ा स्रोत थे और गुरमीत राम रहीम की निजी संपत्ति में योगदान करते थे।

वर्तमान में जेल में बंद आध्यात्मिक नेता की अनुमानित कुल संपत्ति ₹1,450 करोड़ से अधिक है, हालांकि, उनकी और उनके संगठन की संपत्ति का वास्तविक आकार इससे कहीं अधिक बताया जाता है और यह गोपनीयता में लिपटा हुआ है।

आसाराम बापू

आसाराम बापू जो कभी भारत के एक प्रमुख आध्यात्मिक गुरु थे, एक ऐसी शख्सियत हैं जिनका किरदार महत्वपूर्ण प्रभाव और गंभीर विवादों, दोनों से भरा रहा है। उन्होंने एक आध्यात्मिक नेता के रूप में व्यापक लोकप्रियता हासिल की और हिंदू आध्यात्मिकता पर अपनी शिक्षाओं और सार्वजनिक प्रवचनों के माध्यम से बड़ी संख्या में अनुयायियों को आकर्षित किया।

आसाराम की शिक्षाएं मुख्यतः वेदांत और योग पर केंद्रित थीं और वे आध्यात्मिकता के प्रति अपने करिश्माई और गतिशील दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे। उन्होंने पूरे भारत में कई आश्रम स्थापित किए, जो आध्यात्मिक साधना और धार्मिक शिक्षाओं के केंद्र बन गए। इसके बाद से, कार्यशालाओं, पुस्तकों, CD और DVD की बिक्री से एक विशाल आध्यात्मिक साम्राज्य का उदय हुआ है।

आसाराम का जन्म 17 अप्रैल 1941 को भारत के नवाबशाह जिले के बेराणी गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके माता-पिता ने उनका नाम थासुमल सिरुमलानी रखा था। 1947 में भारत विभाजन के समय वे परिवार समेत गुजरात के अहमदाबाद में स्थापित हो गए।पिता के निधन के बाद, उन्होंने अपनी मां से ध्यान और आध्यात्मिकता की शिक्षा प्राप्त की। जिसके बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और देश भ्रमण पर निकल पड़े। भ्रमण करते-करते वे स्वामी लीलाशाह महाराज के आश्रम नैनीताल चले गए और वहां से आध्यात्मक गुरु बनने का सफर शुरू किया।

2018 में अपनी गिरफ्तारी से पहले, जब उन्हें एक नाबालिग से दुष्कर्म का दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, आसाराम बापू की व्यक्तिगत संपत्ति ₹1,100 करोड़ से अधिक थी। अपने विभिन्न विवादों के बावजूद आसाराम बापू ने दुनिया भर में 17,000 से अधिक बाल संस्कार केंद्रों का निर्माण किया है।

श्री श्री रविशंकर

श्री श्री रविशंकर को अमुमन सफेद वस्त्र पहने हुए चेहरे पर शांति और वाणी में मधुरता के साथ अध्यात्मिक ज्ञान देते हुए सुना और देखा गया है। वे शांति और अमन का प्रचार करने वाले अध्यात्म गुरु है, इनका मुख्य उद्देश्य दुनिया के सभी लोगों को चिंता मुक्त करना है। श्री श्री रविशंकर “आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन” के संस्थापक हैं। आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन एक ऐसी संस्था है, जो लोगों को अध्यात्म और मेडिटेशन की तकनीक सिखाती है। वर्तमान समय में आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन की बहुत से देशों में विभिन्न शाखाएं भी खुली गई हैं।

श्री श्री रविशंकर का जन्म 13 मई सन 1956 में तमिनाडु के पापनाशम नामक गांव में हुआ था। इनका जन्म रविवार को होने के कारण इनका नाम रवि शंकर रखा गया। रविशंकर मात्र 4 साल की उम्र में श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों का पाठ किया करते थे। रविशंकर की शुरुआती शिक्षा एमएसई बेंगलुरु स्कूल से हुई। जिसके बाद उन्होंने बेंगलुरु के सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की। विज्ञान के साथ-साथ इनका झुकाव अध्यात्म की ओर होने के कारण उन्होंने वैदिक साहित्य में ग्रेजुएशन किया। शुरूआती पढ़ाई से लेकर ग्रेजुएशन तक का सफर इन्होंने महज 17 साल की उम्र में तय कर लिया था, जो कि एक साधारण बच्चे के बस की बात नहीं है।

See also  प्रधानमंत्री आवास योजना में गड़बड़ी, पंचायत सचिव निलंबित

श्री श्री रविशंकर के शिक्षा पूरे करने के बाद उनकी मुलकात महर्षि महेश योगी जी से हुई। उनके अंतर्गत रविशंकर जी ने धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और अध्यात्म से जुड़े कार्यों में लग गए। वैदिक विज्ञान से जुड़े हुए सभी उपदेशों को श्री श्री रविशंकर ने पूरी दुनिया तक पहुंचाना शूरू किया। अध्यात्म के प्रचार प्रसार के लिए उन्हें दुनिया के दूसरे देशों में भी जाना पड़ता था। प्रख्यात सितार वादक रवि शंकर ने उन पर आरोप लगाया था, कि वह उनके नाम की कीर्ति का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसके बाद उन्होंने अपने नाम के आगे श्री श्री लगाना शुरू कर दिया। तभी से वे श्री श्री रविशंकर के नाम से पहचाने जाने लगे।

अनुमान के मुताबिक श्री श्री रविशंकर की कुल संपत्ति लगभग ₹1,000 करोड़ बताई जाती है, जिसमें आर्ट ऑफ लिविंग केंद्र और स्वास्थ्य सेवा सुविधाएं जैसी संपत्तियां शामिल हैं।

सदगुरु जग्गी वासुदेव

दुनिया में सद्गुरु के नाम से मशहूर जग्गी वासुदेव ईशा फाउंडेशन के संस्थापक हैं, जो एक विश्व प्रसिद्ध आधुनिक गुरू हैं। सदगुरु का जन्म 3 सितंबर, 1957 को कर्नाटक के मैसूर में हुआ था। सद्गुरू ने स्कूली शिक्षा मैसूर में ही प्राप्त की और उसके बाद उन्होंनें मैसूर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहां उन्होंने अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई क्षेत्रों में अपना हाथ आजमाया लेकिन संतुष्टी न मिलने पर उन्होंने अपना व्यवसाय बंद कर, यात्रा करना, योग सिखाना शुरू कर दिया।

सद्गुरु ने अपनी किताब इनर इंजीनियरिंग में बताया है कि एक दोपहर उनके पास करने को कुछ नहीं था इसलिए वे चामुंडी पहाड़ी पर एक शिला पर जा बैठे। शिला पर बैठे-बैठे कब दोपहर से शाम हो गई वे खुद समझ नहीं पाए। इस बीच उन्होंने जो महसूस किया सहगुरू की मानें तो उसे शब्दों में समझा पाना संभव नहीं। उसी एक घटना के बाद सदगुरू ने अपना आध्यात्मिक सफरल शुरू करने का निर्णय लिया।

सद्गुरु की व्यक्तिगत संपत्ति का सही-सही अनुमान लगाल पाना मुश्किल है, क्योंकि विभिन्न स्रोतों के अनुसार यह काफी अलग-अलग पाए गए है। अधिकांश वित्तीय अनुमान और आधिकारिक बयान बताते हैं कि उनकी संपत्ति गैर-लाभकारी ईशा फाउंडेशन से जुड़ी है, जिसे वह व्यक्तिगत रूप से नहीं रखते। मार्च 2024 की कुछ रिपोर्ट्स में सदगुरू की संपत्ती का एक अनुमान बताया गया है, जो ₹468 करोड़ है। कुछ Quora उपयोगकर्ताओं ने सदगुरू की संपत्ती का आंकड़ा $50 मिलियन का भी बताया है, लेकिन यह भी नोट किया है कि उनकी कुल संपत्ति इससे काफी अधिक हो सकती है।

अवधूत बाबा शिवानंद जी

डॉ. अवधूत शिवानंद जी एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु और ‘शिवयोग’ के संस्थापक हैं। शिवयोग एक गैर लाभकारी संगठन है जो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव को कम करने के लिए और लोगों में आंतरिक चिकित्सा को सक्रिय करने के उद्देश्य से दुनिया भर में ध्यान कार्यक्रम आयोजित करती है। अवधूत बाबा शिवानंद जी दुनिया भर में सार्वजनिक व्याख्यान भी आयोजित करते हैं।

डॉ. अवधूत शिवानंद जी का जन्म 26 मार्च 1955 को दिल्ली में हुआ और वे राजस्थान में बड़े हुए। 8 साल की उम्र में वह हिमालयी योगी 108 स्वामी जगन्नाथ के संपर्क में आए, उन्होंने शिवानंद जी को आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद शिवानंद जी ने ध्यान के लिए भारत में कई पवित्र स्थानों का दौरा किया।

शिवानंद जी ने 1995 में शिवयोग फाउंडेशन बनाया। पहला शिवयोग आश्रम दिल्ली में बनाया गया था जहां उन्होंने लोगों को ध्यान का पाठ पढ़ाया। आज 3 शिवयोग आश्रम क्रमश: दिल्ली, लखनऊ और कर्जत में कार्य कर रहे हैं और शिवयोग पाठ्यक्रम भारत में 100 से ज्यादा और दुनियाभर के 2000 स्थानों पर आयोजित किया जा रहा है।

India’s Richest Religious Guru’s : शिवानंद जी की शिक्षा के बारे में बात की जाए तो सितंबर 2016 में, डी वाई पाटिल यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. पी डी पाटिल ने आधुनिक आध्यात्मिक विज्ञान में योगदान के लिए ‘डॉक्टर एमेरिटस’ की उपाधि से शिवानंद जी को सम्मानित किया था। डॉ. शिवानंद जिन्हें अब अवधूत शिवानंद जी के नाम से जाना जाता है, इनकी कुल संपत्ति लगभग ₹45 करोड़ आंकी गई है।