0 परिजनों को पेंशन व अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश
बिलासपुर। हाई कोर्ट ने गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी (जीजीयू) के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की बर्खास्तगी को छत्तीसगढ़ अवैध करार दिया है। न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने आदेश देते हुए कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की मृत्यु हो जाने के बावजूद उन्हें सेवा में निरंतर माना जाएगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उनकी पत्नी और बच्चों को पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ 60 दिनों के भीतर प्रदान किए जाएं।
कुलसचिव ने कर दिया था बर्खास्त
बिरकोना निवासी दिवंगत रामनाथ पांडे वर्ष 1996 में जीजीयू में फर्राश के रूप में नियुक्त हुए थे। नियमितीकरण के बाद वर्ष 2011 में कुलसचिव ने उन्हें अनुपस्थित रहने, अभद्र व्यवहार करने और नशे की हालत में ड्यूटी पर आने के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया। आरोपों के जवाब में पांडे ने स्वयं को निर्दोष बताया, लेकिन उनकी सफाई पर विचार नहीं किया गया। जांच के बाद 8 फरवरी 2013 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
पांडे ने इस आदेश को चुनौती देते हुए 2013 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की। उनका तर्क था कि कुलसचिव के पास बर्खास्त करने का अधिकार नहीं था। ऐसा निर्णय केवल कुलपति ही ले सकते हैं। सुनवाई में अदालत ने पाया कि विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत कुलसचिव को केवल छोटे दंड, जैसे वेतनवृद्धि रोकना या चेतावनी देने का अधिकार है, लेकिन बर्खास्तगी का नहीं। ऐसे मामलों में जांच रिपोर्ट कुलपति को भेजी जानी चाहिए और वही अंतिम निर्णय दे सकते हैं।
कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि कुलपति ने फाइल पर केवल देखा लिखकर हस्ताक्षर किए थे, जो स्वीकृति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इससे स्पष्ट हुआ कि कुलपति ने कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया था।
अदालत ने यह भी कहा कि जांच के दौरान पांडे को गवाहों से जिरह करने का अवसर नहीं दिया गया। जांच अधिकारी ने जिन गवाहों के बयान पर भरोसा किया, उनके नाम चार्जशीट में दर्ज ही नहीं थे। इसके अलावा शराब पीने के आरोप को साबित करने के लिए जो मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी, वह चार्जशीट जारी होने के बाद की तारीख की थी, जिससे उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने इस आधार पर बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए कहा कि चूंकि कर्मचारी का निधन हो चुका है, इसलिए उसे सेवा में निरंतर मानते हुए उसकी पत्नी और बच्चों को सभी सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन को आदेश दिया कि यह प्रक्रिया 60 दिनों के भीतर पूरी की जाए।


