टीआरपी डेस्क। कहते हैं कि अगर इरादे बुलंद हों तो कानून की पेचीदगियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी ने इसे सच कर दिखाया है। सुप्रीम कोर्ट की भरी अदालत में, जहां बड़े-बड़े दिग्गज वकील जिरह करते हैं, वहां इस छात्र ने खुद अपनी पैरवी की और जजों को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि उसके साथ प्रशासनिक चूक हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग किया। ये शक्ति अदालत को तब मिलती है जब किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्थापित नियमों से परे जाकर आदेश देने की आवश्यकता हो।
कोर्ट रूम में वो 10 मिनट: जब जजों ने अथर्व को सुना
फरवरी की एक दोपहर जब कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने वाली थी, तब अथर्व ने जजों से महज 10 मिनट का समय मांगा। अथर्व ने NEET में 530 अंक हासिल किए थे, लेकिन काउंसलिंग और आरक्षण की तकनीकी खामियों के कारण उन्हें EWS श्रेणी में सीट नहीं मिल पाई थी। छात्र का आत्मविश्वास और उसकी सटीक दलीलें देखकर बेंच प्रभावित हुई। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई अभ्यर्थी योग्य है और प्रशासनिक कमी के कारण पीछे रह गया है, तो न्याय सुनिश्चित करना जरूरी है।
ऑनलाइन सुनवाई देखकर सीखी जिरह
अथर्व के पिता वकील हैं, लेकिन वे सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं करते थे। अथर्व की यह तैयारी किसी प्रोफेशनल ट्रेनिंग से नहीं, बल्कि कोविड लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी: लॉकडाउन में अदालती कार्यवाही ऑनलाइन हुई, जिसे अथर्व ने घर पर ध्यान से देखा और दलील पेश करने की शैली सीखी। अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से SLP (Special Leave Petition) का फॉर्मेट डाउनलोड किया, पुराने फैसलों को पढ़ा और खुद ड्राफ्टिंग की। बिना किसी बाहरी मदद के उन्होंने केस फाइलिंग, डॉक्यूमेंट स्कैनिंग और रजिस्ट्री की आपत्तियों को ऑनलाइन ही ठीक किया।
कौन हैं अथर्व चतुर्वेदी?
जबलपुर के रहने वाले अथर्व बचपन से ही मेधावी रहे हैं। उन्होंने मेडिकल और इंजीनियरिंग दोनों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी की थी, लेकिन बायोलॉजी के प्रति उनके लगाव ने उन्हें NEET की ओर प्रेरित किया। दो बार NEET क्वालिफाई करने के बाद जब सिस्टम की कमी आड़े आई, तो उन्होंने हार मानने के बजाय कानूनी लड़ाई को चुना।
शिक्षकों और परिवार का मिला साथ
अथर्व की इस जीत में उनके शिक्षकों का भी बड़ा हाथ है, जिन्होंने उनकी भाषा और प्रस्तुति को निखारने में मदद की। आज अथर्व न केवल जबलपुर बल्कि पूरे देश के छात्रों के लिए एक मिसाल बन गए हैं कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना कितना जरूरी है।


