Independence Day 2026: पंडित सुंदरलाल शर्मा सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक बराबरी, हिंदू-मुस्लिम एकता, स्वदेशी और शिक्षा के प्रबल समर्थक भी थे। उन्होंने उस दौर में छत्तीसगढ़ में सामाजिक बदलाव की ऐसी नींव रखी, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। महात्मा गांधी भी उनके सामाजिक कार्यों से प्रभावित थे और उन्हें सम्मान के साथ अपना अग्रज एवं गुरु मानते थे। यही वजह है कि उन्हें ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ कहा जाता है।
21 दिसंबर 1881 को धमतरी जिले के चंद्रसुर गांव में जन्मे पंडित सुंदरलाल शर्मा ने बचपन से ही साहित्य, समाज और देश के प्रति गहरी रुचि दिखाई। संस्कृत, हिंदी, बांग्ला, मराठी, अंग्रेजी, उर्दू और उड़िया जैसी भाषाओं का उन्होंने स्वाध्याय किया। 1903 में वे कांग्रेस से जुड़े और 1907 के सूरत अधिवेशन में छत्तीसगढ़ के युवाओं का नेतृत्व किया। इसके बाद उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रचार को आंदोलन का रूप दिया। यहां तक कि स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें चलाने के लिए अपनी जमीन-जायदाद तक बेच दी। उनका मानना था कि जब तक गांव आत्मनिर्भर नहीं होंगे और भारतीय स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करेंगे, तब तक गरीबी और गुलामी की जड़ें कमजोर नहीं होंगी।
दलितों को पहनाया जनेऊ
पंडित सुंदरलाल शर्मा का सबसे बड़ा सामाजिक योगदान अस्पृश्यता के खिलाफ उनका संघर्ष माना जाता है। उस समय जब दलितों को सामाजिक और धार्मिक अधिकारों से दूर रखा जाता था, शर्मा ने गांव-गांव जाकर उनके बीच बराबरी और आत्मसम्मान की भावना जगाई। उन्होंने दलित समाज के लोगों से यज्ञ करवाए और उन्हें जनेऊ धारण कराया। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि समाज में उनके समान अधिकार और सम्मान का संदेश देना था। जनेऊ धारण करते समय उनसे मांस और नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करने की प्रतिज्ञा भी कराई जाती थी। उनका स्पष्ट मानना था कि अस्पृश्यता भारतीय समाज की कमजोरी और गुलामी के प्रमुख कारणों में से एक है।
एकता के लिए हिंदू-मुस्लिम विवाद में बने सेतु
पंडित सुंदरलाल शर्मा धार्मिक सद्भाव और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। 1925 में धमतरी में हिंदू-मुस्लिम तनाव के दौरान उन्होंने दोनों पक्षों के बीच संवाद और समझौते की कोशिश की। उनके प्रयासों से विवाद शांत हुआ और दोनों समुदायों ने उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया। इस घटना ने यह साबित किया कि उनके लिए स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों से मुक्ति का नाम नहीं थी, बल्कि समाज को आपसी भेदभाव से मुक्त करना भी उतना ही जरूरी था।
कंडेल सत्याग्रह और गांधी जी का छत्तीसगढ़ आगमन
छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कंडेल नहर सत्याग्रह का विशेष स्थान है। अगस्त 1920 में किसानों ने नहर संबंधी अन्याय के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। पंडित सुंदरलाल शर्मा ने इस आंदोलन को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से 20 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी पहली बार छत्तीसगढ़ आए। गांधी जी ने रायपुर, धमतरी और कुरूद में सभाओं को संबोधित किया और लोगों में स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को मजबूत किया। बाद में 1933 में गांधी जी के छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान भी पंडित सुंदरलाल शर्मा के सामाजिक और अंत्योदय संबंधी कार्यों की प्रशंसा की गई। यही वह रिश्ता था जिसने शर्मा को छत्तीसगढ़ में गांधीवादी विचारों के प्रमुख वाहकों में शामिल किया।
जंगल सत्याग्रह में जेल, लेकिन हौसला नहीं टूटा
1930 में जंगल सत्याग्रह का नेतृत्व करने के कारण पंडित सुंदरलाल शर्मा को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें राजद्रोह के मामले में दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और अंग्रेजी शासन का दमन सहना पड़ा। लेकिन जेल और यातनाएं भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकीं। उनका जीवन सत्य, अहिंसा, स्वदेशी और सामाजिक समानता के विचारों के प्रति समर्पित रहा।
कलम से भी लड़ी आजादी की लड़ाई
पंडित सुंदरलाल शर्मा साहित्यकार भी थे। कविता, नाटक और लेखन में उनकी विशेष रुचि थी। उन्होंने हिंदी और छत्तीसगढ़ी में करीब 18 ग्रंथों की रचना की। ‘प्रह्लाद चरित्र’, ‘करुणा पचीसी’, ‘प्रह्लाद पदावली’, ‘ध्रुव चरित्र’ और ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला’ जैसी रचनाओं के जरिए उन्होंने साहित्य को सामाजिक चेतना से जोड़ा। छत्तीसगढ़ी बोली को सम्मान दिलाने और साहित्यिक पहचान देने के प्रयासों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
शिक्षा और स्वावलंबन पर दिया जोर
शर्मा का मानना था कि अंधविश्वास और अज्ञानता को खत्म करने का सबसे प्रभावी रास्ता शिक्षा है। उन्होंने राजिम में संस्कृत पाठशाला और वाचनालय की स्थापना की। रायपुर के ब्राह्मणपारा में बाल समाज पुस्तकालय की स्थापना का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे। कृषि से भी उनका गहरा जुड़ाव था और उन्होंने आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाया। खेती में सफलता के लिए 1914 में उन्हें शासन की ओर से सम्मानित भी किया गया।
28 दिसंबर 1940 को हुआ निधन
देश की आजादी देखने से पहले ही 28 दिसंबर 1940 को पंडित सुंदरलाल शर्मा का निधन हो गया। लेकिन उनका जीवन आजादी की लड़ाई और सामाजिक परिवर्तन की ऐसी विरासत छोड़ गया, जिसे छत्तीसगढ़ आज भी याद करता है। आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत में जब हम स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, तब पंडित सुंदरलाल शर्मा की कहानी हमें यह संदेश देती है कि देश की आजादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी- यह सामाजिक बराबरी, शिक्षा, स्वदेशी, सद्भाव और आत्मसम्मान की लड़ाई भी थी।


